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उम्मीद

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कईं सालों बाद    उनसे हुई मुलाक़ात
हमारे पुराने शहर से 
बदलेे-बदले, नये से फिर भी पहचानें से थे हम बिलकूल दोस्तसे
दिनभर की हसीं-मजा़क से जगीं थी एक उम्मीद,  की यह हंसी शाय़द रह जाएं जिंदगीभर !
- Swati October 30, 2017

पल

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वैसे तो हर पल
जी ही लेते है !
कभी हसते, कभी उलझते, कभी सुलझाते, कभी रो-रो कर तरसते, सिर्फ जिये ही जाते;
उस पल को लेकीन  हमने एक - दुसरे की  ईट पर ईट ड़ालकर  जो फासले तोड़े है, की ईटोंके टुकड़ोंमेंसे खिलती-हसती ज़िंदगी पायी।

- Swati May 12, 2017 11.09 am

चांद

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पूनम की रात को  आयी एक सौगात ।

जिसकी सिर्फ आहट से  उम्मीदोंकी रोशनी  बस सी गई है  गरीबखानेकी ईट ईट पर ।
हाए ! 
इस चांद की अमावस कभी न हो ।।
- Swati May 11, 2017 9.00 pm

बदल दे

हो जा निड़र 
न रहे सिमट कर 
कर सीधे मुकाबला  न रहे छिपछिपकर
कर जो है पसंद  चुकाकर उसकी कीमत
न डर हर पल  कर ले सामना जुटकर
सपनोंको बुन  सपनोंको साकार कर जी ले, जी भरकर  छोड़ना मत हार मानकर
बन जा खुद बदलाव बदलाव का रास्ता ताकना छ़ोडकर 
- स्वाती,  मार्च 08, 2017

ब़ेशक़

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कुछ लम्होंके साये में
आता है एक जुनून सा जो मिट़ाता है सारे शक़
अपनी गंभीरता की छाॅव में ;

कुछ़ शांत पलोंमें मिल जाती है शक्ती
पूरे होशोंसे जुट़नेकी,
की किया जाए वो,
रहा है जो बाकी करनेसे ;

शांती की इस आँधी में
बचा वहीं, जिसे था बचाना
संभलने को मजबूरी न बनाना
यहीं समझ़ लेना, ब़ेशक़ ।

- स्वाती February 14, 201720.45

बह जा

कुछ लम्होंके साये में
आता है एक जुनून सा
जो मिट़ाता है सारे शक

अपनी गंभीरता की छाॅव में
कुछ़ शांत पलोंमें
मिल जाती है शक्ती
पूरे होशोंसे जुट़कर करनेकी,

वो, जो रहा है बाकी करनेसे
शांती की इस आंधी में
जो बचा बस वहीं है जिसे था बचाना
बाकी सबने बस था बह जाना

- Swati , Feb 14 2017 00. 55 am

सहभावना

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कभी-कभी
हावी हो जाती है
छ़ा जाती है सोच-विचारोंपर;
बिलकूल जैसे स्किझोफ्रेनिया  सारे अंतरंग को दुभंग करती;
अपने हर हिस्से को बनाती है किसी औरही की असलीयत । या फिर ज़ोड़ देती है  अपनी असलीयत से
किसी गैरकी होनी-अनहोनी ।
कैसे माने की  गैर के खुशी या गम का एहसास एकही ?;  सहभावना !
सुख़ से दर्द़ तक की ,
अज़ीब समानता,  पूरी की पूरी इन्सानीयत 
एक सोच है सहभावना ।
- Swati February 06 2017 16.32 Mumbai

आज़ाद !

कहते है की आज़ाद है
पंछी की तरह

आज़ादी के नाम पर
कहीं बंध ही नहीं रहे है

ज़ख़ड रहे है फैसलोंके दायरे
नक़ाब ओढे आज़ादी का

अब इतना समझ़ ही लिये
तो जान लो,

आज़ादी निभानेके लिये
अकेले दायरे संम्हलना नहीं काफी 

मगर जरूरी है
साथ जुड़कर जंजीरे पिघलाना ।


- स्वाती January 25 2017 18.24 India

राह

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अब भी बाकी है,
वह रास्ता पकड़ना;


उस आसमांमें, सुना है  चांद और सूरज रहते है  साथ-साथ, हमेशा ;
पूरी जिंदादिली को सिमटे, ना कोई तड़प न कोई तलाश;
एक एहसास, जो रहता है  खुशबूभरी राह में ।

- Swati January 25, 2017 6.54 am Mumbai

अकेलापन

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कहते है की, खा जाता है अकेलापन !

फिर भी, मगर
कुछ ऐसा दे जाता है 
अपने भीतर की हम बन गये है हमसफऱ - अपने-आप के;
क्या खूब दोस्त अकेलापन !
बिछ़डते वक्त  उसकी कमी ऐसे छ़ोड़ गया  की उसके न होने का एहसास हीं न हो ।
बिछ़डने पर भी,  इसकी बाँटीं हुई खैरात, होती हैं मेरे पास, हर पल ।
मेरे अंदर की जिंदादिली को संवाँरता यह प्यारासा दोस्त, जो, फ़िर कभीं यहाँ, आने़ से रहा ।

- स्वाती 30.12.2016; 11.18 am

नोट !

सपनों के सौदागरोंने
क्या क्या बता बता कर
वोट ले लिये
ढाई सालों बाद भी
जब सपने तो पुरे होने से है
तो यह अब नोट वापस ले रहे है
- स्वाती 11 . 11. 2016 18.45 मुंबई

मह़कसी

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कभी सोच कर भी  न किया विश्वास  की होंगे फिरसे जिंदादील
जहां पर न होगी परेशानी किसीके नाराज़ होनेकी  या खुद़ पर तरस आने की
अब यह जो एहसास  छ़ाया है मुझ़ पर की  जब तक रहेंगी साॅंसे  बस रहूूंगी मजे़ में  हर लम्हा, जी भरके  सिर्फ उस पलके साथ 

आते हुए सच को बाहोंमें लेते,  जिंदगी के साथ, मह़कसी

- स्वाती   October 27, 2016, 16.45

थमासा लम्हा

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आशा है, की बस थम जाये एक लम्हा, आनेवाले कल का ।
सुरज की धीमी रोशनी,
हलकीसी, खुशबूभरी हवा

साथ-साथ सांसोंमे सोयेसे,
लिपटी हुई निंदोमें जगेसे, अपने आप में दुनिया समेटेसे,

हसीं

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कभी कभी हसीं ऐसी की,
खुद़ की कमजोरी का एहसास छूपाने की चाह
कोई हसींके सिलवटोंसे दिखलाते जाए
ताकी कोई अपनी कमजोरी पर न खाए तरस
कभी कभी हसीं ऐसे की
चेहरे की नसोंकी हो रही हो कसरत
मायूसी भरे चेहरे पर चढ़ाया हो रंगीन चष्मा
जो सब कुछ औरही गहरा दिखाये जाए ।
और फिर कभी आती है एक
खिली हुई मुस्कुराहट
फैलीसी , चेहरेके ऊपर - भीतर,
जैसे की रौनक पर रंगोंकी बारिश हो जाए ।

- स्वाती September 27, 2016

चुनाव

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हाथ पर हाथ ङाले

यूॅहीं, बैठै बेठै 
हलकीसी नींद में भी
स्थिर रहना सीख़ लिया,
क्या करे?,
अपने कंधे पर,
अपने सिर को
ऊंचा रखने का
जब चुनहीं लिया ।

स्वाती, September 04, 2016.  20.13      Khandala Ghat

चुभ़न

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कभ़ी न कभ़ी तो बह ही जाना
मकस़द यहीं मोतीयोंका


ताकी,

जान पर सवार चुभ़न से निपट़ कर
जिंदगी सवंर जाए


स्वाती , September 04, 2016, 19.27 Pune

चाह

सोचते है कुछ पाये ऐसा  की मिलकर खुशी हो जाए उसके पाने का इंतजार खत्म हो जाए
ताकी जान सके हम
की उसके पाने से पहलेकी तड़प
बेवजह तो न थी

क्या क्षणिक और खोख़ला था यह सुख?
या मिल रहा है सुकून, तह ए दिल तक?

अब तो नहीं पता क्या होगा अनुभव ?
अब तो है बस हम इस उम्मीद पर
की जिंदगी में कुछ पल, शायद
मिलेगा हमें भी वह सब
जिसे नहीं पाया अब तक


- स्वाती August 17, 2016 11.00 am

बेवजह़

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वैसे जरूरी तो नहीं है
कुछ भी, फिर भी;


कभी-कभी, कुछ-कुछ,
हो जाते है जरूरत ;

जैसे की सांसे लेना,
या हौसला रख़ना !



- Swati, August 17, 2016 11.30 am

बरख़ा

इस बरस की बरसात
धो रही है बहुत कुछ
जो नह़ी निकल पाया
कोशिशों के बावजूद

नज़र मे धुंदलाते रंग
और हाथ न आती मकड़ी
सारे कुछ धूल रहे है
सर पर बरस रही है जो कबसे

बूंदोंके अनदेखे मोती
चले आ रहे है साथ
कुछ जालोंका सफ़ा कर
रोशन करने कुछ पल

कीचड़ को बहा के ले जाना
बरबाद रिश्तोंसे छुटवाना
एक सद़ी की बिदाई कर
अपने - आप जिंदादिली का एहसास !

इतना कुछ करती भी है यह बारिश ?
चलो अब तो उसीने बताया,
की है उसका वास्ता ज़िंदगी से
अब पहचाना, तो इसे मानो !


- स्वाती August 03, 2016.  17.21 pm

सौगात

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राह में चलते - चलते
थम से गये थे 
यह सोच कर ङरे से,
की अब तो इस सङक पर
कोई और नहीं बचा ।

सब पत्ते झड गये
और मौसम तो
सदाही रहेगा पतझङ का,
अबसे, यहांपर,
न होगी बारिश,
न आयेगी चैत की आहट;

केवल उछलेंगे यादोंके साये
इसी सिलसिलेमें लेकीन
उस अजीब पल पर
पाया की मेरे साथ है कोई,
सबसे सुंदर दोस्त
जो कभी छूटी ही नहीं मुझसे;

मेरी अपनी, मुझमें से ही पायी,
जिंदगी की शुरूवात से अंत तक की
सूरज किरणोंसी सौगात
जो बसी है मुझही में,
हमेशा साथ - साथ  ।

- स्वाती  July 30, 2016 9.45 am