बरख़ा

इस बरस की बरसात
धो रही है बहुत कुछ
जो नह़ी निकल पाया
कोशिशों के बावजूद

नज़र मे धुंदलाते रंग
और हाथ न आती मकड़ी
सारे कुछ धूल रहे है
सर पर बरस रही है जो कबसे

बूंदोंके अनदेखे मोती
चले आ रहे है साथ
कुछ जालोंका सफ़ा कर
रोशन करने कुछ पल

कीचड़ को बहा के ले जाना
बरबाद रिश्तोंसे छुटवाना
एक सद़ी की बिदाई कर
अपने - आप जिंदादिली का एहसास !

इतना कुछ करती भी है यह बारिश ?
चलो अब तो उसीने बताया,
की है उसका वास्ता ज़िंदगी से
अब पहचाना, तो इसे मानो !


- स्वाती August 03, 2016.  17.21 pm

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