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Showing posts from August, 2016

चाह

सोचते है कुछ पाये ऐसा  की मिलकर खुशी हो जाए उसके पाने का इंतजार खत्म हो जाए
ताकी जान सके हम
की उसके पाने से पहलेकी तड़प
बेवजह तो न थी

क्या क्षणिक और खोख़ला था यह सुख?
या मिल रहा है सुकून, तह ए दिल तक?

अब तो नहीं पता क्या होगा अनुभव ?
अब तो है बस हम इस उम्मीद पर
की जिंदगी में कुछ पल, शायद
मिलेगा हमें भी वह सब
जिसे नहीं पाया अब तक


- स्वाती August 17, 2016 11.00 am

बेवजह़

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वैसे जरूरी तो नहीं है
कुछ भी, फिर भी;


कभी-कभी, कुछ-कुछ,
हो जाते है जरूरत ;

जैसे की सांसे लेना,
या हौसला रख़ना !



- Swati, August 17, 2016 11.30 am

Borders

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Borders are drawn,
Restriciting entry or exit
A thing that binds, together
That which may not bind

And it seperates the souls
Whose bond can't be unbound

Its a limit imposed,
A mechanism of control,  ?
Or a method of torture?

Minding by State?
Or State of Mind?

No matter what,
Borders are definitive.

Drawing a Border
Drawing a Line
Could it be animalistic?
Or mere game of survival?


- Swati , August 14, 2016 9.29 am

संभ्रम

पावसातला सह्याद्री आठवत
खुशालते चेरापूंजीतल्या धुक्यात
अन् खंडाळा घाटातल्या धुक्यात
सुखावते मेघालयाच्या आभासात

कुठं म्हणायचं, कशाला आपलं ?
कोण असतं, कशाला, कोणाचं ?

चार ठाव जगताना
सार्या आकाशाला कवळत
कशाला वागवायचं ओझं वेड्यागत ?

खूणावतं काही दूरून,
की आभासातच ते पण ?

जोडत जायचं काही-बाही
कशाला, उगाच विनाकारण ?

धुक्यातले गुपीत,  क्षणोक्षण टिपत आठवणींचा खेळ,  वा पांघरून कधी स्वप्नांची झालर बसून गप्पगार, विचारात स्वगत
काही करून होईना,  जे गेले व्हायचे राहून काय गरज ज्याची,  जर जगले त्यावाचून.

- स्वाती 14 ऑगस्ट 2016 8.41 am

The Descendants

Enjoying the bundle of goodies
Bestowed upon by the ancestors,

Coming to terms with bitterness thrown upon,
When you least expected while living,

It is is sharing every bit of it,
In thick and thin with those who matter,

Guarding the gifts for others
Relishing cosy midnight snack
With the ones who would carry your legacy.


- Swati, August 8, 2016 15.23 English, On Life As Such, Poems about Good Films

बरख़ा

इस बरस की बरसात
धो रही है बहुत कुछ
जो नह़ी निकल पाया
कोशिशों के बावजूद

नज़र मे धुंदलाते रंग
और हाथ न आती मकड़ी
सारे कुछ धूल रहे है
सर पर बरस रही है जो कबसे

बूंदोंके अनदेखे मोती
चले आ रहे है साथ
कुछ जालोंका सफ़ा कर
रोशन करने कुछ पल

कीचड़ को बहा के ले जाना
बरबाद रिश्तोंसे छुटवाना
एक सद़ी की बिदाई कर
अपने - आप जिंदादिली का एहसास !

इतना कुछ करती भी है यह बारिश ?
चलो अब तो उसीने बताया,
की है उसका वास्ता ज़िंदगी से
अब पहचाना, तो इसे मानो !


- स्वाती August 03, 2016.  17.21 pm

तीन जणींसाठी हायकू

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1.
एक छोटूकली, नादात ठुमकत
येत होती शाळेतनं परत
पावसाच्या धारा, उन्हाचा पिसारा
इवल्याशा पावलांचा लोभस तोरा.

2.

कुठे शून्यात नजर, धुंद जोशात ही पोरं,
रिमझिम पावसात, वळवळता सिगारेटी धूर
गर्द गुलाबी लेऊन, उभे साक्षात जीवन
आब राखत चालली स्वप्ननगरीची लय

3.

आज फिरायला आली, बाई गुंडाळून कामं
झाडावरची पालवी बघे टक लावून
चाल खंबीर, डौलदार असे धुंद नादमग्न
सारे जीवन घालते पायघड्या वाटेतून


क्षण वेचावे छोटेसे मनाला हवेसे,
क्षणा-क्षणांत रमतेअसे जीवन हवे-हवेसे



-  स्वाती, August 02 2016

Moment

Baby girl Walk-dancing in rain.
While on the way to school,
Dancing in rhythm oblivious of the street, She was amused for evry bit of her world
And then came the youth, In her lively dark pink, engrossed in smoking her cigarate, She resembled the lively fashion parade.
Madam in a mood for a long walk after work Enjoying the gentle breez of the rainy day
Warm sunlight afrer thundering showers Her lively gaze to the city of her deeds Personifies the life within, that very moment,

- Swati , August 01, 2016 12.45 pm