सौगात

राह में चलते - चलते
थम से गये थे 
यह सोच कर ङरे से,
की अब तो इस सङक पर
कोई और नहीं बचा ।

सब पत्ते झड गये
और मौसम तो
सदाही रहेगा पतझङ का,
अबसे, यहांपर,
न होगी बारिश,
न आयेगी चैत की आहट;

केवल उछलेंगे यादोंके साये
इसी सिलसिलेमें लेकीन
उस अजीब पल पर
पाया की मेरे साथ है कोई,
सबसे सुंदर दोस्त
जो कभी छूटी ही नहीं मुझसे;

मेरी अपनी, मुझमें से ही पायी,
जिंदगी की शुरूवात से अंत तक की
सूरज किरणोंसी सौगात
जो बसी है मुझही में,
हमेशा साथ - साथ  ।

- स्वाती  July 30, 2016 9.45 am


Comments

chanda asani said…
खूबसूरत सी स्वाती जो आप के अंदर छुपी थी।
Swati Vaidya said…
Love you dear Chanda, you have been a great source of strength to find her and bring her back!

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