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Showing posts from July, 2016

सौगात

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राह में चलते - चलते
थम से गये थे 
यह सोच कर ङरे से,
की अब तो इस सङक पर
कोई और नहीं बचा ।

सब पत्ते झड गये
और मौसम तो
सदाही रहेगा पतझङ का,
अबसे, यहांपर,
न होगी बारिश,
न आयेगी चैत की आहट;

केवल उछलेंगे यादोंके साये
इसी सिलसिलेमें लेकीन
उस अजीब पल पर
पाया की मेरे साथ है कोई,
सबसे सुंदर दोस्त
जो कभी छूटी ही नहीं मुझसे;

मेरी अपनी, मुझमें से ही पायी,
जिंदगी की शुरूवात से अंत तक की
सूरज किरणोंसी सौगात
जो बसी है मुझही में,
हमेशा साथ - साथ  ।

- स्वाती  July 30, 2016 9.45 am

पल भर

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कुछ पल कितने अजीब आए
'आज और अभी', के साथ-साथ
'सदियों पहले कभी', भी पास-पास लाए ।


कौनसी ताऱीख़, क्या समय, लगाए इसे ?
इसमें तो साथ-साथ तीन अनुभव समाए ।

एक था वर्तमान , जिसमें सिमटा था आपात,
उसी पल, दोनों कालोंके, दो लम्हों के साथ ;
वहां पर जम गयी थी मैं, कुल्फीस़ी,
एक अजीब वास्तव, सिर्फ पलभर !


- स्वाती  July 10, 22.43

रहीसी ...

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चले थे जो कुछ देर साथ;
अब तो, वे कहां? और हम यहां ।

होते है इर्द-गिर्द, अब जो भी,
पता नहीं उन्हें की हम कौन? और है कहां ?

हमारी नज़रसे, हममें है जिंदगी,
बसने से रहींसी, बस यहां ।

- स्वाती, July 3, 2016, 17.30