Thursday, December 31, 2015

क्या है यह?

पूरा के पूरा, सांझ़ा, खुद के साथ!

यह कैसा एहसास है?
आजकल छाया हुआ?,
की फुरसत ही नहीं देता
अपने से अलग होने की !



न आने देता है यहां पर,
उस पुराने हमसफर कमजोरी को,
न फिरकने देता है मेरे पास
किसी लड़ाईपर जानेकी शुरूवात को ।


ना होता है आसपास कोई ड़र
किसीसे टकराने का,
और लापता है बिलकूल
सारे आक्रमकता के नक़ाब
जो मंड़राते थे यहाँ वहाँ हमेशा ।


मेरी जरूरत के गुल़ाम,
जो लगभग बने थे मालिक
मेरे भीतरी ख्यालोंके !


अब पता नहीं कैसे
रख पाती हूँ दूर इन्हे?

अपनेसे बिलकूल दूर ...
उनकी हजार कोशिशोंके बावजूद
होती हूँ मै जिंदादिल


मेरे अपने मुझमें, पूरी की पूरी,
सांझ़ी, सवारी, खुद के साथ।



-  Swati December 31, 2015 23.14

Friday, December 18, 2015

Layered

Woven in soft n tough,
Strings of connections
that conseal details;



Shielding all strings
that would cause attachment
to guard internalised existance;


Display of guarded actions,
gentle sounding bluntness,
only to reveal the veiled layers of 

Resigned Connectedness.

- Swati, December 18, 2015

Monday, December 14, 2015

शांती

चलते चलते आ जाते है
ऐसे मकाम पर
जहां नहीं होता है एहसास
ना अपमान ना सम्मान का ;


और ना हीं सताती है यादें
कुछ पल शोक जिनका मनाया
या कुछ जिनसे खुशी मनाई;


बिलकूल मध्यम सा एहसास
दमदार धीमी सांसोंके
खुशहाल मिज़ाज का
जहां पर परेशानी हारती है !








                          



                                 





















- स्वाती   December 14 2015