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Showing posts from September, 2015

शुक्रीया

कल है आज़ादी की
दूसरी सालगिरह
सोच रहे है,
क्या जश्न मनाया जाएँ?

या फिर
सुख - दु:ख बाटने
कोई नह़ीं तो,
सोग मनाया जाएँ?

पता नहीं क्या करें

तो फिर अच्छा है
सिर्फ शुक्रगुज़ार रहे,
की कमसे कम
निराश तो नह़ी है ।

आज़ादी का शुक्रीया


- स्वाती              Sept 10, 2015   20.02 pm

बरसात!

इस बरस है खोखली बरसात
रोज के खोखले भाषणोंसी

बस गरजती है,
आनेके का नाम नहीं ।

लगता है
सीख रही है प्रकृती
कुछ-कुछ नेताओंसे



-   स्वाती    Sept 10, 2015

जगता - जगता ....

काय काय गोळा करत असतो ?
कधी इकडे तिकडे विखूरलेल्या
हव्याशा क्षणांची शिदोरी ;

तर कधी गुंडाळून, वाट बदलून
मागे ढकललेले असेच काय काय. ..


पण करतोचना, गोळा - बेरीज?
वेचता, वेचता,
सारे जे जगून चुकले
अन् जगण्यावाचून राहिले

सारा प्रवास हा असा
खरंतर या गणितादरम्यान !
क्वचितच कधी
सारं हवं तसं मांडून
राखत ताठ मान


-   स्वाती   September 03 2015       23.42

खामोशी

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जहाँ होता है खत्म
भाव - अभाव का एहसास

कहीं जुड़ने के या
कहीँ से छूटने के
दरम्यान का
बेखयाली सफर

बहूत जोरदार से
कमजोर करनेवाला
एक स्वयंपूर्ण अनुभव

कहीं इसकी आदत न हो जाए  !


- स्वाती, September 03, 23.31

नमी

बुनते है कभी रिश्ते

सोचते की
कंबलसे लपेटे
महसूस करेंगे,

कभी - नमी और गर्मी ।

अफसोस की वह तो
बस आखोंको
आसूओंसेही मिली ।


- स्वाती September 02, 2015 23.28