सोच

सोचा था,
कुछ पा रहे हैँ
अतः कुछ खो भी दिया,
तो कोई बात नहीं ।

अब ढूंढ रहे हैँ
कबसे, जो लगा
की पाया था, उसका
कहीं अता-पता ही नहीं ।

क्यों लेते है, कोई सड़क?
जहाँ हमारे रह-गुजर की
कोई निशानी ही नहीं।

पता है की जिंदगी
मिलती है बेवक्त
मगर इस इंतजार की सीमा का 
कोई अंदाजा ही नहीं ।

रहते है सतर्क हर पल
लेकीन हर नईं सुबह
एक नया जहाँ लायेगी
यह सोच छूटे
ऐसी कोई बातही नहीं ।

आते सारे पल
खोलते जिंदगी की परत
उन्हे खूबसुरत बनाने की चाह
मिटे ऐसी कोई गुंजाइश नहीं  ।


- स्वाती April 07, 2015 

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