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छोड़

छोड़  खुद को छोड़ दे खुद के हाल पर |
बेहोश हो जाए वह जो घसीट लाए
तुम्हे इस मकाम पर ||

चंद मासूम सपनोंकी आस पर |
क्यों मरे कोई हर पल,
एक ज़िंदा लाश बनकर ? ||

बेवजह ढुंडते है जमीर सड़क पर |
गाड आये थे जिसे हम
दिल औ दिमाग की दहलीज पर ||

उन लम्हों का साया सा मन पर |
बाँध रहा है हर पल
दिल के उम्मीद को कस कर ||

छोड़ दे खुद को खुद के हाल पर |
बन जा इक लहर
जो न मिटेगी नैय्या पार होने पर ||

- स्वाती अप्रैल २२, २०१२